मंशा राक्षस :- Friend wrote an essay on human social evolution and moving to a big city
मंशा राक्षस
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आप जब अपने जीवन के अनुभव लिखते हैं, लोग उसे आत्मकथा समझ लेते हैं।पर यह आत्मकथा नहीं—यह समय के उस सूक्ष्म अंश का लेखा है, जो पृथ्वी की आयु में शायद क्षण भी नहीं ठहरता।
जब आप अपने काम के लिए एक ऐसे शहर में आते हैं, जो विकास की दौड़ में सबसे आगे है,तो परिवर्तन केवल स्थान का नहीं होता—वह दृष्टि का होता है।वह मनुष्य को भीतर झाँकने और अपने ही अस्तित्व पर प्रश्न करने को विवश करता है।
बड़े शहर पहले भी देखे थे, पर उन्हें जीना शेष था।यहाँ आकर समझ आया कि आज सफलता की पहचान यह नहीं कि आप क्या हैं,बल्कि यह है कि आप कितनी भीड़ में रहते हैं।
पर विडंबना देखिए—जिस मनुष्य की प्रकृति सामाजिक होना है, वही आज सबसे अधिक अकेला है।मैंने सोचा था, जहाँ इतने लोग साथ रहते हैं, वहाँ संवेदना भी अधिक होगी।पर यहाँ लोग साथ नहीं रहते—सिर्फ साथ दिखाई देते हैं।मनुष्य अपने अस्तित्व के कारण को भूलता जा रहा है।उसके अस्तित्व का एक मूल कारण सामाजिक होना है,और यदि हम उद्विकास को भी एक ओर रख दें, तो सामाजिकता से अधिक शायद ही किसी और तत्व ने मनुष्य को संभाला हो।
जब मैंने बाल्यकाल में इतने बड़े शहर—या यूँ कहें इतने लोगों के एक साथ रहने, ढलने और सीखने की जगह—की कल्पना की थी,तो लगा था कि लोग और अधिक सामाजिक बन चुके होंगे। वे शायद उसी क्रम में आगे बढ़ रहे होंगे, जिसमें हमारे पूर्वजों ने इंसानियत का विकास किया था।
मैं यह मानने में संकोच नहीं करता कि आज हम विकास की गति में उनसे आगे हैं,परंतु यह विकास अधिकतर तकनीकी, चिकित्सकीय और उन साधनों तक सीमित रह गया है,जो जीवन को आसान बनाते हैं—गहरा नहीं।
मैंने पहले दिन जब अपना सामान यहाँ की एक विकसित ‘सोसाइटी’ में रखा, तो एक क्षण के लिए आशा जागी— कि जिस भूमि पर कभी एक परिवार बसता था,वहाँ आज सौ परिवार साथ रह रहे हैं।
परंतु यह केवल दूर से दिखने वाला एक भ्रम था। पास आकर समझ आया कि समीकरण कुछ और ही है— दूर से जो इमारतें सौ परिवारों को समेटे दिखती हैं,पास जाकर पता चलता है कि हर घर में एक व्यक्ति अपनी ही दीवारों में क़ैद है।
लेकिन जैसा कि मशहूर शायर “निदा फ़ाज़ली” ने लिखा है—
“हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी,
जिसको भी देखना हो, कई बार देखना।”
इसी पंक्ति को मन में रखकर जब मैंने अगला महीना बिताया,तो यह स्पष्ट होने लगा कि लोग 35 वर्ष की आयु में ही अधेड़ क्यों प्रतीत होने लगते हैं। वे खुश दिखाई देते हैं, पर भीतर से नहीं होते।उनका एक हिस्सा सच जानता है, पर वही किसी दबे हुए भाव के अधीन है— जो उन्हें खुलकर जीने नहीं देता।
जब मैंने इस विषय पर और सोचा,तो पाया कि उनके सपने अब भी जीवित हैं,परंतु जैसे किसी कारावास में बंदी जीवन काटता है,वैसे ही उनके सपने भी अपनी सज़ा पूरी कर रहे हैं।
एक बंदी शायद अपनी सज़ा पूरी कर ले, पर इन सपनों की सज़ा उम्र से भी लंबी है— जो अंततः मृत्यु के बाद राख बनकर बहा दी जाती है,और संसार वैसे ही चलता रहता है, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
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लोग अक्सर एक 8 वर्ष के बच्चे और एक 83 वर्ष के वृद्ध में बहुत अंतर देखते हैं।उन्हें लगता है कि दोनों के बीच एक पूरा जीवन खड़ा है।परंतु वास्तविकता यह है कि वह वृद्ध भी कभी वही बच्चा था,जिसने खुले आकाश में अपने सपनों को देखा था। दोनों एक ही व्यक्ति हैं— बस एक के पास समय था, और दूसरे के पास अब केवल स्मृति है।और अब शायद बहुत देर हो चुकी है।अब वह चाहकर भी अपने सपनों को पूरा नहीं कर सकता।
इस पूरे विचार का कोई अर्थ नहीं,यदि मनुष्य यह न समझे कि उसका जीवन किसी पूँजीवादी व्यक्ति के सपनों को पूरा करने का साधन मात्र नहीं है। उसका जीवन स्वयं का है—और उन लोगों का है जो उससे जुड़े हैं।
परंतु वह अपने अधूरे सपनों की कीमत पर एक व्यवस्थित जीवन खरीद लेता है। वह अपने ख़्वाबों को किस्तों में बेचता रहता है,और एक दिन पूरा घर उसका हो जाता है— बस वह स्वयं उसमें कहीं नहीं होता।
अब वह केवल इस जीवन के समाप्त होने और नए जीवन के शुरू होने का इंतज़ार करता है, ताकि वह फिर से सपने देख सके— शायद इस बार उन्हें पूरा करने के लिए। पर संभव है, वह फिर भी ऐसा न कर पाए।
हमारे देश में एक प्रसिद्ध कवि हुए “गजानन माधव मुक्तिबोध” , जिन्होंने अपनी कविता “ब्रह्मराक्षस” में ऐसे व्यक्ति का वर्णन किया है— जिसके पास अथाह ज्ञान होता है, परंतु यदि वह उस ज्ञान को समाज के उत्थान में लगाए बिनाया अगली पीढ़ी को सौंपे बिना इस संसार को छोड़ देता है, तो वह ब्रह्मराक्षस बन जाता है— एक ऐसा अस्तित्व जिसे कभी मुक्ति प्राप्त नहीं होती।
इसी विचार से प्रेरित होकर, मैं एक नया शब्द प्रस्तावित करता हूँ— “मंशा राक्षस”।
वह व्यक्ति जो सपने तो देखता है,पर उन्हें पूरा करने का साहस या प्रयास नहीं करता। वह भी अपने ही अधूरेपन में बँधा रह जाता है—और शायद कभी मुक्त नहीं हो पाता।
✒️ लेखक की पंक्तियाँ
“ख़्वाबों को सीने में दफ़्न कर के जी रहे हैं,
ज़िंदा तो हैं, मगर अपनी मौत के मुंतज़िर हैं।”
“हमने ख़्वाबों को क़त्ल किया, ख़्वाबों ने हमें,
फ़र्क़ बस इतना है—वो दफ़्न हुए, हम ज़िंदा रह गए।”